गुरुवार, 6 जनवरी 2011

भाव

कांइ सोच्यो व्हैला भाव
अरथां री आंगळी पकड़ र
भाजता फिरां ला सबद सबद
 भीख मांगता अरथां री
तकता इतहास
सोधालां नूवो अरथावणो!

3 टिप्‍पणियां:

  1. सोणी कविता है जी।

    नया साल की बधाई।

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  2. bahut hi sunder ..rajasthani mein esi adhunik kavita abar re daur mein virli hi ej hai kiran aap bilkul sahi raste methe kavya re maram ne samjhta thaka baihr huya ho badhai aapne !!

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  3. एक विराट भाव को बीज रूप में समाहित किये है कविता.

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