बुधवार, 19 जनवरी 2011

.....हिंडोळा , ऐ आळी

.....हिंडोळा , ऐ आळी
चांदणी पकड़ आगळी
चांद री
नर्तन करै
आंगणे
सांवळी चदरिया
लुक गी कठेइ...

ओळा में,
आंख्यां टमकावती
रात बैठी
चुपचाप
बातां करे ज्यां
आपूंआप,
रुनझुण म्हारी पायल
ओरुं चंचल हूंगी ,
झिलमिल
तारां आळी ओढणी
अर उणारी निजरां
रा प्रेम हिंडोळा
आळी ! कियां न झूलू म्हें ?

किरण राजपुरोहित नितिला

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

भाव

कांइ सोच्यो व्हैला भाव
अरथां री आंगळी पकड़ र
भाजता फिरां ला सबद सबद
 भीख मांगता अरथां री
तकता इतहास
सोधालां नूवो अरथावणो!

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

. म्हारा भगवान

.    म्हारा भगवान
.    हर छिण इ
.    छू अर नीसरे
.    वै!
.    मनै
.    म्हारे सपनां नै
.    इच्छावां नै
.    म्हारी कामनावां नै
.    अर हवळेस
.    बुचकार र
.    केई पांवडा
.    धकै लेय जावै ,
.    म्हारी तकदीर नै
.    म्हारी कामनावां नै
.    मंजळ कानी
.    आंगळी पकड़ र ,
.    ज्याणे भगवान व्है
.    म्है आकासै जोउं
.    निहाल निजरां सूं
.    पण....
.    छियां निजर आवै
.    म्हारे मातासा री
.    म्हारै  पापासा  री
.    ओह!!!
.    वै तो उणारी आसीसां है!!
.    ......किरण राजपुरोहित नितिला

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

पीठी रा गीत

पीठी के गीत बन्ना या बन्नी को पीठी चढाते समय गाये जाते है।  इस गीत में पति अपनी पत्नि से पूछते है कि
आपकी चूनड़ी तेल से कहां भरी ?
आपके हाथ पीले कैसे हुये? तब पत्नि कहती है कि सुंदर से  बन्ना के पीठी उतारते समय हाथ पीले और चूनड़ी तेल से चीगटी हुई है।
पीठी में हल्दी बेसन और जौ के आटे के साथ तेल मिला उबटन होता है।


पीठी  रा   गीत
नरेन्दरसिंघसा पूछै बालमिया!
थांरे चूनड़ चींगट कठै रे होई?
थांरा हाथ जी पीळा कठै रे होया?
रायजादा नै तेल चढावंतड़ा
रुपरोड़ा ने तेल चढावंतड़ा
म्हारी चूनड़ पीळी वठै रे होई
म्हारा हाथ जी पीळा वठै रे होया !

अरविंद सिंहसा पूछै बालमिया!
थांरे चूनड़ चींगट कठै रे होई?
थांरा हाथ जी पीळा कठै रे होया?
रायजादा नै तेल चढावंतड़ा
रुपरोड़ा ने तेल चढावंतड़ा
म्हारी चूनड़ पीळी वठै रे होई
म्हारा हाथ जी पीळा वठै रे होया !

बुधवार, 3 नवंबर 2010

हिवड़े रा भाव




हिवड़े रा भाव
सब्दां रै ढीले बंध में
कियां बाधूं  !
हिवड़े रा भाव मरम ढाळूं तो
 लिपि विखरे
मातरावां सूं नी ताबै
आखरां सूं आपळता
स्वरां नै नीं सांबळै
इण हिये रा भाव !
सूत्र बणा र सांवट ल्यूं
फर्मा में ही टीप द्यूं
रीत रिवाज सूं अळगा
गणित विज्ञान नी है
हिवड़े रा भाव
जो सोचूं
 वै कियां लिखूं
सोचां नै समझ समझावै
 थाम थाम र राखूं पण
म्हासूं धके भाज जावै
गोखां सूं झांक इ ल्यै
हिवड़े रा भाव
..किरण राजपुरोहित नितिला

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

बनो गीत

बनो गीत
लंबा तो केस बनी नै रखड़ी जी सोवे
रखड़ी रा निरखण घर कद आवो ,
ओ केसरिया थांरी मनै ओळूं जी आवै
ओळूं जी आवै बनी नै धान नई भावै,
मैला चढती नै हिचकी जी आवै
ओ केसरिया थांरी  मनै ओळूं जी आवै ।।
   
गोरो सो हिवड़ो बनी नै हार जी सोवे
नेकलेस रा निरखण घर कद आवो
  ओ केसरिया थांरी मनै आंळूं जी आवै
ओळूं जी आवै बनी नै धान नई भावै,
मैला चढती नै हिचकी जी आवै ।।

 लंबा तो हाथ बनी ने बाजूबंद जी सोवे
गजरां  रा निरखण घर कद आवो
 ओ केसरिया थांरी मनै ओळूं जी आवै
ओळूं जी आवै बनी नै धान नई भावै,
मैला चढती नै हिचकी जी आवै ।।

गोरा सा पगल्या बनी नै  पायल जी सोवे
बिछिया रा निरखण घर कद आवे
ओ केसरिया  थांरी मनै ओळूंजी आवै
 ओळूं जी आवै बनी नै धान नई भावै,
मैला चढती नै हिचकी जी आवै ।।

रविवार, 26 सितंबर 2010

वीरो गीत

वीरो गीत
 बजारों में बाजै जंगी ढोल
दरवाजे नौपत घुर रया जी
आया म्हारा जामण जाया वीर!
चुनड़ लाया रेशम जी
आया म्हारा माता जाया वीर
चूनड़ लाया पचरंगी जी !

पल्लां उपर हीरां रो जड़ाव
घूंघटा पर घूघरा जी
नापूं तो हाथ पांच!
तोलूं तो पूरा तोळा तीसरी
मेलूं तो तरसे म्हारो जीव
ओढूं  तो हीरा झड़ पड़े जी !

ओढूं म्हारा लाडलड़ा रै ब्याव
च्यारुं पल्ला रळकंता जी
देखे म्हारा देवर जेठ!
सायब आवे मुळकंता जी
देखे म्हारा सोई परवार
सायब देखे मुळकंता जी !