रविवार, 23 मई 2010

अेक पीड़


अेक पीड़
 दिनां रै फेर में
दिलां रा फरक यूं
दिखै
पैला
उणरे रात रात जागवा में
अेक विस्वास हौ
आस ही
चोखो सोरो भविस हो ,
आज उणरी इण हालत में
घणो दुख अर पीड़ है
क्यूं क उणरी
आस विस्वास
उणरो बेटो
सैर री चमक दमक देख‘ र
व्हे ग्यो उणसूं  अळगो
जीवण तो यूं इ बीत जावैला
पण
कोई बतावै ???
उणरी आस क्यूं टूटी .....

दुआ करुं
मिंदर मैल टूटै भले
परभु!!!!!!!
विस्वास कोय रो नीं टूटै ....


आ कविता म्है  बारवी में भणती जद लिखी ही ।
इनै सगळा रै सामी लावण री हिमत आ इज जुटा सकी हूं ...नीं जाणु  क्यूं !!!!
जिणानै देख ‘ र लिखी वै आज दुनिया में नी है पण उणारो दरद आज ई ज्यूं रै त्यूं म्हारे सागै है  इण आखरा  ,इण  कागद रै नाई।

4 टिप्‍पणियां:

  1. दुआ करुं
    मिंदर मैल टूटै भले
    परभु!!!!!!!
    विस्वास कोय रो नीं टूटै ....
    kiran ji rajasthani nahi jaanta lekin in panktiyon ne man moh liya... sachmuch... vishwas nahi tootna chahiye... sunder rachna

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  2. aapki rachnao mein ek alag bat hai! Gahre antar ki anubhutiyo ka ehsas deti.
    Bahut bahut shubh kamnayein aisi aur rachnao ke liye.
    S K Saraswat

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