बुधवार, 19 जनवरी 2011

.....हिंडोळा , ऐ आळी

.....हिंडोळा , ऐ आळी
चांदणी पकड़ आगळी
चांद री
नर्तन करै
आंगणे
सांवळी चदरिया
लुक गी कठेइ...

ओळा में,
आंख्यां टमकावती
रात बैठी
चुपचाप
बातां करे ज्यां
आपूंआप,
रुनझुण म्हारी पायल
ओरुं चंचल हूंगी ,
झिलमिल
तारां आळी ओढणी
अर उणारी निजरां
रा प्रेम हिंडोळा
आळी ! कियां न झूलू म्हें ?

किरण राजपुरोहित नितिला

3 टिप्‍पणियां:

  1. चांदणी पकड़ आगळी
    चांद री
    नर्तन करै
    आंगणे
    सांवळी चदरिया
    लुक गी कठेइ...

    सुंदर बिंब है
    आभार

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  2. आपकी रचना वाकई तारीफ के काबिल है

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  3. आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा अति उत्तम असा लगता है की आपके हर शब्द में कुछ है | जो मन के भीतर तक चला जाता है |
    कभी आप को फुर्सत मिले तो मेरे दरवाजे पे आये और अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाए |
    http://vangaydinesh.blogspot.com/
    धन्यवाद

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